एक नदी - तीन धारा
नमस्ते!
जयचंद्र मेहता ( Instagram ) जी द्वारा लिखी गई कहानी " एक नदी - तीन धारा " को साझा करने जा रहा हूँ।
जयचंद्र मेहता ने जो संदेश दिया है, वह बहुत ही विनम्र और दिल से लिखा हुआ है:
एक नदी - तीन धारा
तेलियाही, एक ऐसा गाँव था जो सूखी धरती और तपते सूरज के लिए जाना जाता था। यहाँ की जिंदगी हमेशा से एक संघर्ष रही, जहाँ कभी फसल अच्छी होती तो कभी परिवार का पेट भरने के लिए भी अनाज कम पड़ जाता। इसी गाँव में एक विशाल संयुक्त परिवार रहता था, जिसकी जड़ें खेती-किसानी में गहरी थीं।
इसी परिवार में तीन भाई थे, जयचंद्र, प्रेमचंद और धनंजय, जिनका आपसी बंधन उस सूखी धरती पर किसी मीठे पानी के सोते की तरह था। उनके दादा-दादी ने वह घर बनाया था जहाँ उनके माता-पिता और तीन चाचा-चाची भी अपने बच्चों के साथ रहते थे। यह घर हमेशा लोगों और चहल-पहल से भरा रहता था। इसी माहौल में, सबसे बड़े भाई, जयचंद्र ने कॉर्पोरेट में अपना रास्ता बनाया, जो अपने काम में कुशल और भरोसेमंद था। मझले भाई, प्रेमचंद ने परिवार की जमीन से जुड़ी विरासत को एक नए रूप में अपनाया और एक ड्राइवर बन गया, जिसके पास कार और ट्रैक्टर जैसी कई गाड़ियाँ थीं। और सबसे छोटा, धनंजय, सेवा की भावना के साथ, पास के अस्पताल में एक ऑपरेशन थिएटर असिस्टेंट बन गया, और वह परिवार का दिल था, जिसकी हँसी किसी त्योहार के गीत की तरह फैल जाती थी।
उस बड़े से पुश्तैनी घर में पले-बढ़े इन भाइयों ने न केवल खुशियाँ, बल्कि मुश्किलें भी बाँटना सीखा था। उन्होंने कई बार फसल खराब होते और घर में अनाज की कमी होते देखी थी। उन्होंने अपने माता-पिता और चाचाओं को खेतों में पसीना बहाते और चिंता करते देखा था, और यही एकता और संघर्ष उनके खून में बस गया था। उनके बीच एक अनकहा नियम था: कोई शिकायत नहीं, केवल सहानुभूति। अगर धनंजय से कोई गलती हो जाती, तो जयचंद्र शांति से उसे सँभाल लेता, जबकि प्रेमचंद अपनी बातों से उसका दिल बहला देता। अगर प्रेमचंद की कोई गाड़ी खराब हो जाती और काम रुक जाता, तो कोई यह नहीं कहता, "मैंने तो पहले ही कहा था," बल्कि जयचंद्र आर्थिक मदद के लिए हाथ बढ़ाता और धनंजय उसका पसंदीदा खाना बनाकर उसका हौसला बढ़ाता।
जैसे-जैसे समय की धारा बहती गई, और गाँव धीरे-धीरे तरक्की करने लगा। जयचंद्र, जो कॉर्पोरेट में काम करता था, ने गाँव में एक नया, आधुनिक घर बना लिया। प्रेमचंद, जो एक ड्राइवर था, अपने परिवार के साथ उसी पुश्तैनी घर में ही रहा, जहाँ उसकी गाड़ियों के लिए भी जगह थी और जहाँ अब भी उसके माता-पिता और एक चाचा का परिवार रहता था। धनंजय, जो अस्पताल में काम करता था, ने पास में ही एक छोटा, आरामदायक घर बना लिया। उनका एक घर अब तीन खुशहाल परिवारों में बँट चुका था, फिर भी उनकी जड़ें तेलियाही की मिट्टी में एक साथ मजबूती से जमी रहीं।
लेकिन उनका असली खजाना उन पलों में जाहिर होता था जो सबसे ज्यादा मायने रखते थे।
जब छठ का त्योहार आता, तो गाँव एक अद्भुत नज़ारा देखता। जयचंद्र और धनंजय अपने-अपने घरों से निकलते और उस विशाल पुश्तैनी घर पर आकर मिलते, जहाँ प्रेमचंद रहता था। उनके चाचा-चाची और चचेरे भाई-बहन भी वहीं इकट्ठा होते। वह घर एक उत्सव के केंद्र में बदल जाता। आँगन में बच्चे दौड़ते, औरतें रसोई में एक साथ काम करतीं, उनकी बातों और हँसी से हवा भर जाती, और बड़े-बुजुर्ग बरामदे में बैठकर पुरानी यादें ताजा करते। इसी खुशी के माहौल के बीच, तीनों भाई, एक शांत कोना ढूंढकर बैठ जाते, और उनकी बातें ऐसे बहतीं मानो एक पल भी न बीता हो। यह कई परिवारों का उत्सव नहीं था; यह एक ही विशाल परिवार था, जो हर साल और भी बड़ा और मजबूत हो जाता था।
लेकिन उनका बंधन दुःख के समय में भी उतनी ही चमक से निखरता था। एक साल, मानसून आया ही नहीं। सूखे ने धरती में दरारें डाल दीं और फसलें खेतों में ही जल गईं। गाँव पर एक बड़ी आर्थिक मुसीबत आ पड़ी, और परिवार की जमा-पूँजी खत्म होने लगी। इससे पहले कि उनके माता-पिता की हिम्मत जवाब देती, जयचंद्र और धनंजय वहाँ मौजूद थे। जयचंद्र ने अपनी कॉर्पोरेट की तनख्वाह से घर का खर्च संभाला, यह सुनिश्चित करते हुए कि किसी को खाने की कमी न हो। प्रेमचंद ने अपनी गाड़ियों से पास के कस्बों में काम ढूँढ़ना शुरू कर दिया, ताकि बाहर से कुछ आमदनी हो सके। धनंजय ने अपनी कमाई का हर एक पैसा परिवार पर लगा दिया। उनके पिता और चाचाओं ने मिलकर परिवार की देखभाल की और जो कुछ भी बचाया जा सकता था, उसे बचाने की कोशिश की। किसी ने एहसानों का हिसाब नहीं रखा। यह बस वही था जो एक परिवार करता है।
सालों बाद, जब उनके बालों में चाँदी उतर आई थी और तीनों भाई अक्सर अपने पुश्तैनी घर के आँगन में बैठकर उस सूखी, शांत धरती को देखते, जिसने उन्हें बहुत कुछ सिखाया था।
उन्होंने अलग-अलग जीवन बनाए थे, तीन धाराओं की तरह, जिन्होंने अपना-अपना रास्ता बनाया, लेकिन वे सभी एक ही स्रोत से निकले थे—एक किसान परिवार की एकता और प्रेम से। और हर त्योहार, हर खुशी और हर परीक्षा में, वे धाराएँ हमेशा एक साथ वापस बहतीं, और बिना शर्त प्यार की एक शक्तिशाली, अनदेखी नदी में मिल जातीं जो उनके दिलों से होकर बहती थी।
तेलियाही के लोग जानते थे कि भाइयों की कॉर्पोरेट नौकरी, गाड़ियाँ और अस्पताल का काम उनकी असली दौलत नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी संपत्ति वह अटूट, अनकहा और खूबसूरत बंधन था जो उन्होंने अपने पूर्वजों से विरासत में पाया था।
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जयचंद्र मेहता की ओर से एक संदेश, उनकी कहानी "एक नदी - तीन धारा" को पढ़ने के लिए धन्यवाद के साथ साथ:
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इस कहानी के माध्यम से मेरा प्रयास बस इतना था कि हम जीवन की आपाधापी में उन अनमोल रिश्तों को न भूलें जो हमारी नींव हैं।
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